जाने कहाँ से आया था महेमान बन के वो।
रहने लगा था दिल में भी पहचान बनके वो।
वो आया जैसे मेरा मुकद्दर सँवर गया।
मेरा तो रंग रुप ही मानो निख़र गया।
करने लगा था राज भी सुलतान बन के वो।
वो जानता था उसकी दीवानी हुं बन गई।
उसके क़्दम से मानो सयानी सी बन गई।
ख़्वाबों में जैसे छाया था अरमान बनके वो।
हरवक़्त बातें करने की आदत सी पड गई।
उस के लिये तो सारे जहां से मैं लड गई।
एक दिन कहाँ चला गया अन्जान बनके वो।
कहते हैं “राज़” प्यार, वफ़ा का है दुजा नाम।
ईस पे तो जान देते हैं आशिक वही तमाम।
उस रासते चला है जो परवान बन के वो।
शत्रु की छाया से लड़ते रहे लोहिया
-
संयोग ऐसा हुआ कि मित्र कुमार मुकुल की लोहिया वाली किताब कई बार हाथ लगी और
फिर दूर चली गई जिससे आद्योपांत पढ़ा जाना संभव न हो सका था। आज फिर उसे पढ़ने
हेतु ...