दिल में रहा करते थे पहले प्यार की तरह.
जेहन में पड़ गए हो अब दरार की तरह..
रिश्तों के फ़र्ज़ तुमसे निभाए नहीं गए
फैलाए रहे हाथ इक हक़दार की तरह.....
मांगी नहीं थीं नेमतें तुमसे ज़माने की
तुमने निभाया साथ भी व्यापार की तरह....
ख्वाहिश थी कि चख लूँ दो घूँट प्यार के
तेरे लफ्ज़ दहके सदा अंगार की तरह.....
अब रूठा-रूठी का न हमसे खेल खेलिए
जज़्बात ढह चुके मेरे दीवार की तरह.....
लम्बी हो उम्र तेरी, दुआ तेरे लिए की
अब जी रही है "चाँदनी" मज़ार की तरह...
शत्रु की छाया से लड़ते रहे लोहिया
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संयोग ऐसा हुआ कि मित्र कुमार मुकुल की लोहिया वाली किताब कई बार हाथ लगी और
फिर दूर चली गई जिससे आद्योपांत पढ़ा जाना संभव न हो सका था। आज फिर उसे पढ़ने
हेतु ...