जब तक स्पंदन हैजीवन है
जगत है ,पथ है, विपथ है, राग है , विराग है,
जीवन की साँझ है, और सुप्रभात है,
पराई साँझों का,
उधार लिए हुए अस्तित्त्व का सारा यह खेल है,
किंतु इस खेल में, मन रम गया है जब से देखा है,
अबोध से बालक का चेहरा
सृष्टि काकलरव गान करता हुआ
सावन तेरे तन मन से भीगकर लाल हो चुका है
और मैं स्वप्नों के वन्दनवार सजाये चल पड़ा हूँ
ईस्ट की साँझ में
तुम्हारी अभिलाषा लिए
अपना तो कुछ भी नहीं
जिस पर मैं दंभ करूँ
फ़िर भी जीवन के सारे मोह सजाये आ गया हूँ
तुम्हारे शहर की देहरी पर
स्वीकार- अस्वीकार के प्रश्न से अनभिज्ञ ।
शत्रु की छाया से लड़ते रहे लोहिया
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संयोग ऐसा हुआ कि मित्र कुमार मुकुल की लोहिया वाली किताब कई बार हाथ लगी और
फिर दूर चली गई जिससे आद्योपांत पढ़ा जाना संभव न हो सका था। आज फिर उसे पढ़ने
हेतु ...
सुन्दर रचना । आभार ।
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