बुधवार, 24 मार्च 2010

परिवर्तन
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हम जब उनसे पहली बार मिले थे
वह इस तरह चहके थे मानों
पतझड़ में ही ढेरों फूल खिले थे
मेरी हर बात उनके लिए
गीता के श्लोक और कुरान की आयतें थीं
मिलता था तो मानों रेगिस्तान में
हो गई हो बारिश, भीग जाता था तन-मन
हम अपनी हते थे वह अपनी सुनाते थे
दोनों ए दूसरे के सुख-दुख में
हाथ बंटाते थे
सोचा था यह सिलसिला चलेगा अनंत
जब भी दुखों की पड़ेगी काली छाया
औषधि बन उनके दो मीठे बोल
कर देंगे उसका अंत
मगर क्या मालूम था क़ी वह हमारा भ्रम था
क्योंकि उन्हें फूलों से प्रेम तो था मगर
सिर्फ उन भौंरों और तितलियों की मानिंद
जिनका काम है सिर्फ रस लेना और भूल जाना
सचमुच उनका भी आचरण अब कुछ ऐसा ही है
सब कुछ इतना बदल गया यकीन नहीं होता
शर्म आती है कहने और बताने में
क्योंकि अब तो उनका ईमान भी पैसा ही है
माना बदलाव प्रकृति का नियम है
मगर परिवर्तन इतनी तेजी से आएगा
आदमी, आदमी को भूल जाएगा
तो भला इस धरती पर कौन
इंसान नजर आएगा।

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